Kanooni Mohabbatein

By Shraddha Upadhyay, RGNUL Punjab, 3rd year

क़ानूनी मुहब्बतें-1

“ये जो तुम हर बात के साथ सुप्रीम कोर्ट की अथॉरिटीज़ झाड़ती हो न, बड़ा ही हसीन लगता है.”

“और तुम्हारा मेरे फंडामेंटल राइट्स इन्फ्रिंज करना बिल्कुल रोमांटिक नहीं है.”

“अब तुम हर चीज़ को धारा २१ में डालोगी तो और क्या होगा.”

“ये कुछ बेसिक ज़रूरतें होती हैं मुहब्बत की.”

“मुहब्बत में क्या सिर्फ़ ज़रूरतें होती हैं ज़िम्मेदारियाँ नहीं होतीं.”

“होती हैं ज़िम्मेदारियाँ भी पर वो एन्फोर्सीएबल कहाँ हैं.”

“जिसकी नींव पर रिश्ते मज़बूती पाते हैं उसी पर सबका डिस्क्रीशन है, ज़िम्मेदारियों के बिना सारे अधिकार खोखले होते हैं, शायद इसीलिए आजकल बंधन इतने नाज़ुक होते जा रहे हैं.”

“अब तुम ये डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स की नसीहतें न दो. अच्छा एक बात बताओ.”

“हाँ पूछो.”

“ये मैं अपना नाम यूनियन ऑफ़ इंडिया के आगे रखूँ या पीछे?”

“मतलब?”

“मतलब तुम बुद्धूराम हो.”

“अच्छा मेरी वकील साहिबा, कोर्ट हमारे बीच से कितना दूर है.”

“जितना तुम रख सको.”

“जानेमन तुमने बस क़ानून ही पढ़ा है, क़ानून की सियासत नहीं जानी तुमने.”

“व्हाट?”

“यही कि तुम मेरे लव का सोक्रेटिक आईडिया हो.”

“तो मैं हूँ कि नहीं?”

“पता नहीं, प्रिसिडेंट ढूँढो.”

“मैं क्या गर्तों में दबे किसी अधिनियम की भूली हुई धारा हूँ?”

“मैं भी कहाँ आर्टिकल १२ वाला स्टेट हूँ.”

“हाय मेरी क़ानूनी महबूबा.”

“उफ़्फ़, मेरे वैधिक आशिक.”

“बस यही प्रार्थना है कि हमारे इश्क़ की मार्जिनल यूटिलिटी कभी कम न हो.”

“लॉ ऑफ़ डीएमयू को तोड़ना भी इतना आसाँ न होगा.”

“तुमसे हर पल ये मुक़दमे जीतना भी कहाँ आसाँ था.”

“तुम्हें पता है तुम्हारी आँखों में मुझे संविधान दिखता है.”

“मुझे आजकल ऐसा फील होता है कि तुम्हारे क़ानून की दुकान बन गया हूँ.”

“हाय कानून घर है मेरा उसे धंधा तो न करारो.”

“तुम्हारा घर होगा, आम आदमी की तो क़यामत है.”

“क़यामत के पार जन्नत और दोजग दोनों ही हैं.”

“दोनों की अलग-अलग कीमत है.”

“तुम जो बार-बार आईना दिखाते हो न, मेरी उम्मीदें और बढ़ जाती हैं.”

“निराशा के अँधेरों में आशाओं के तारे गिनने की तुम्हारी आदत का ही तो कायल हूँ.”

“तुम मुझे इसी तरह बांधें रखना, जान.”

“नहीं तो क्या सुप्रीम कोर्ट ले जाओगी?”

“क्यों क्या अदालत उसकी नहीं होती?”

“तुम न क़ानून की ही बात करो, उसका फ़लसफ़ा तो जहाँ का हिजाब है.”

“तुम्हें पता है तुम मेरे लव के सोक्रेटियन आईडिया का परफेक्ट मेनिस्फेस्टेशन हो.”

क़ानूनी मुहब्बतें – 2 

“तुम्हारे इन रोज़-रोज़ के ब्रेक-अप पैच-अप से मेरा तो मुहब्बत से इन रेम विश्वास उठ गया है.”

“अब तुम तो ऐसे कहते हो जैसे अपने इख्तियार में हो कुछ.”

“तुम करो तो बेइख्तियारी और मैं करूँ तो बेवफ़ाई.”

“अब जफागर वफ़ा का ज़िक्र न ही करें तो अच्छा है. अपना लोकस स्टैंडाई भी तो देखो.”

“और तुम अदालत नहीं जो मुझ मासूम को कातिल करार दो.”

“कातिल भी हो दिलदार भी हो.”

“हाय हाय, और तुम वकील भी हो मुंसिफ भी हो.”

“इस बार जो पैच अप के टाइम तुमने बातें कहीं थी, उनको अगले झगड़े में ओबिटर कहकर नॉन-बाइंडिंग करार दिया था. कहीं तो ज़मीन पकड़ो, जान.”

“अब तुम्हारी अदालत के तो नियम ही निराले हैं. देखो ऑडी अल्टरम पार्टम अब तो नेचुरल जस्टिस का हिस्सा है.”

“अब यूँ हिस्से-बखरे की बात करते हो जैसे मेरा दिल कोई इम्मूवेबल प्रॉपर्टी हो.”

“तुम्हारे दिल गर प्रॉपर्टी है तो मेरी मुहब्बत आईपीआर.”

“इस ज़िन्दगी के सिर न जाने कितने एक्ट हैं.”

“आज जो कह रहा हूँ उसे केसवानंदा भारती मान लो मुहब्बत का.”

“ऐसे कितने मुंसिफ तुमने औं ब्लों बिठा लिए.”

“वो इम्पोर्टेन्ट नहीं हैं. बात ये है कि बंधन जब तक आज़ाद रहें हसीन रहते हैं.”

“मैंने कहाँ किसी को बाँधा है कभी.”

“अच्छा, ये बताओ कि तुम मुझे क़ानून मानती हो या क़ानून मुझ पर मनाती हो.”

“जी और भी ग़म है ज़माने में मुहब्बत के सिवा. इश्क़ के सूफ़ी होने से आदमी खुदा नहीं बन जाता.

“लो जी यहाँ भी ओवर्रुल हो गए.”

“अब आप ऐसे आर्ग्यूमेंट्स देते क्यों हैं?”

“ये इश्क़-मुहब्बत के केस में स्टेयर-डेसिसिस तो होता नहीं कि कोई रेफ़रेन्स रहे.”

“वो तो है सारे आर्ग्यूमेंट्स अपने मेरिट पर डिसाइड होते हैं. अब अपील तक बात पहुंचे तो अलग बात है.”

“जाना, हम संविधान की नज़र से चलेंगे, हर बात पर गवाही लेने से यूँ आवाज़ में दरारें पड़ जाती हैं.”

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कानूनी मुहब्बतें-3 

“क्या मेरे लिए चाँद-तारे ला सकते हो?”

“नहीं कोई वादा तो नहीं कर सकता, वैसे भी इंडियन कॉन्ट्रैक्ट एक्ट, 1872 की धारा 56 के अनुसार ये कॉन्ट्रैक्ट वोइड होगा.”

“क्या हर बार लिटरल रूल ऑफ़ इंटरप्रिटेशन अप्लाई करना ज़रूरी है? सारा मज़ा खराब कर दिया.”

“अब जान ये क़ानून मैंने तो नहीं बनाया, शिकायत करनी है तो सर रोमिली से करो.”

“मुहब्बत के पलों में ये बेहुदी बातें करना तुम्हारी फ़ितरत हो गई है.”

“फ्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन क्या मुहब्बत के समयों में नहीं होती?”

“जाओ पटको सिर संविधान पर, अब मेरी तरफ़ मत आना.”

“पर फ्रीडम टू मूव एनीवेयर इन द टेरिटरी तो तब भी होगी.”

“तो घूमो, मैं तो जा रही अपने रास्ते.”

“अरे यार सॉरी, अब तुम तो लिटरल मत लो.”

“जानते हो दीदी की शादी के लिए घरवाले मान ही नहीं रहे. तुम यहाँ इक्वलिटी और फ्रीडम की बात करते हो और वहाँ दीदी की हालत देखकर क़ानून में आग लगाने का मन होता है. इतने साल हो गए पर धर्म-जाति आज भी हमें जकड़कर बैठे हैं.”

“इनको बताओ कि दुनिया-जहाँ में यही हो रहा है.”

“पर इंटरनेशनल लॉ बाइंडिंग भी तो नहीं है.”

“वो भी है. अब मान लो दीदी ने शादी कर भी ले घरवालों की पसंद से तो हिन्दुस्तान जैसा हाल हो जाएगा, सत्ता किसी की और क़ानून किसी और का. अब संविधान की धारा 372 को ही देख लो, सरकार हिन्दुस्तानी होगी और क़ानून अंग्रेज़ी.”

“और तो और कोई शिकवा भी नहीं करता. जाना हम क़ानून के साये में चलेंगे ये रवायतों के रास्ते अक्सर पैर तोड़ देते हैं.”

“और फिर कल गर लिमिटेशन पीरियड ख़त्म हो गया तो कौन गुहार सुनेगा? हम आज ही आज़ादी का पेटीशन डाल देते हैं.”

“यूँ क़ानून मनाने के लिए कचहरी जाना ज़रूरी नहीं, रूल ऑफ़ लॉ तो घरों में भी हो सकता है. बार-बार तथ्यों पर जिरह करने से भावना क्षीण हो जाती हैं.”

“यूँ तो मैं तुम्हारे हुस्न पर भी कायल होता पर जब तुम घर की देहरी में न्याय की रोशनी लाती हो तो मेरी संविधान बन जाती हो.”

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